अर्जुन या पंडित कभी कहीं अकेले गए हों बहुत कम होता था।
मौसी, मामा या बुआ के घर भी दोनो हमेशा साथ ही जाते थे, लेकिन उस दिन अर्जुन को अकेले सीता पुर जाना पड़ा।
सीता पुर नदी पर इनके गांव से कोई सात-आठ किलोमीटर दूर छोटा सा गांव था जहां अर्जुन की कोई रिश्ते की मौसी रहती थी, अर्जुन को किसी काम से जल्दी में उनके घर जाना पड़ा।
वह सुबह अकेला सायकल लेकर चल गया, लौटने में उसे रात हो गयी वह कोई दस ग्यारह बजे उधर से जंगल के रास्ते अकेला लौट रहा था।
अर्जुन जैसे ही नदी पार करके अपने गांव की सीमा में पहुंचा उसे सड़क पर कुछ लोग सामने से दौड़ते हुए आते दिखाई दिए जिन्होंने एक ही जैसे सफेद कपड़े पहन रखे थे।
इससे पहले की अर्जुन कुछ समझता या अलग बचकर चलता ये दौड़ते हुए उसे पार करके निकल गए और पीछे कुछ दूर जाकर सड़क पर घेरा बना कर सिर नीचे किये बैठ गए।
उफ़्फ़फ़!! ये क्या ? ये लोग ऐसे बिना टकराए कैसे मुझे पार कर गए जैसे मानो इंसान न हों हवा के झोंके हों,,
हवा!!?, अर्जुन सोचते हुए चोंका,, उसने इधर उधर देखा
ये बिल्कुल उस जगह खड़ा था जहां धबल की भूत से कुश्ती हुई थी, अर्जुन का दिल धक-धक करने लगा,,
तो क्या ये सच में भूत, कहीं छलाबा तो नहीं??,
सोचते हुए अर्जुन सायकल पकड़े गए बढ़ने लगा।
आगे कुछ ही दूर चला होगा कि सामने सड़क पर राख का ऊंचा पहाड़ जैसा ढेर पड़ा था।
अब ये बीच सड़क पर रख किसने डाल दी यार, सारा रास्ता ही बन्द कर दिया थोड़ा बचाकर नहीं डाल सकता था,, सा,,,
अर्जुन गालियां देता हुआ बड़बड़ाने लगा।
अभी वह किधर से निकलूं ये सोच ही रहा था कि अचानक उस रख में हलचल होने लगी ।
देखते ही देखते राख ने एक बड़े मोटे सांप की आकृति ले ली और फन उठाकर उसके ठीक सामने खड़ा होकर फुफकारने लगा सांप कोई तीन चार फुट मोटा और करीब बीस तीस मीटर लंबा उसके ठीक सामने एक साथ कई फन लहराता फुंकार रहा था और हर फुंकार में भयानक गर्जना के साथ आग की लपटें भी निकल रही थी।
अर्जुन को मार्च की ठंडी रात में भी जेठ की दुपहरी जैसा पसीना आने लगा,, वह धीरे धीरे पीछे हटने लगा।
तभी उसे पीछे बैठे भूतों का ख्याल आता और उसके कदम रुक गए।
उसका दिल धुकधुकी और फेफड़े धौंकनी बने हुए थे, भय से उसके पैर कांप रहे थे।
वह ना आगे जा सकता था और न ही पीछे जा सकता था उसने निराशा में अपनी आंखें बंद कर लीं।
तभी उसके कानों में पंडित की आवाज गूँजी,, "हमारा डर ही छलाबे कि असली ताकत है और एक निश्चित दायरा उसकी सीमा रेखा जहां से वह हमें डराता है।
अर्जुन ने मुट्ठी भींचते हुए झटके से आंखे खोल दीं अब उसकी आँखों में डर के स्थान पर विस्वास और क्रोध था।
वह अपनी सायकल पर बैठा ओर बिना डरे उसने सायकल उस सांप की तरफ बढ़ा दी।
सांप बिल्कुल किसी बैल जैसी आवाज निकलते हुए फुंकारने लगा आग फेंकने लगा,, लेकिन वह अर्जुन को छू भी नहीं रहा था और अर्जुन बिना डरे आगे निकल आया।
थोड़ा ही आगे बढ़ा होगा कि वह भूतों की टोली उसे फिर से बीच सड़क पर नज़र आयी, उन्होंने कुछ हथियार लिए हुए थे और एक आदमी की गर्दन रेत रहे थे,, उनके बीच कुछ सर कटी लाशें पड़ी हुए थीं और उनमें से कुछ के मुंह पर खून भी लगा हुआ था।
सड़क पर भी खून फैला हुआ था उनके चेहरे बीभत्स नज़र आ रहे थे।
अर्जुन के कदम एक बार फिर ठिठके लेकिन फिर ना जाने क्या सोच कर उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गयी और उसने सायकल आगे बढ़ा दी।
उसके बढ़ते ही उनके चेहरे बदलने लगे और ये लोग उसका रास्ता छोड़कर सड़क के दोनों ओर खड़े हो गए।
अर्जुन ने देखा वे लोग इसे देख कर मुस्कुरा रहे थे।
लौट कर अर्जुन घर आ गया लेकिन अब फिर से इसका दिल जोरों से धड़क रहा था।
अर्जुन ने सुबह सबसे पहले दौड़ कर पंडित को रात की सारी आपबीती सुनाई।
पंडित मुस्कुरस्ते हुए बोला चलो देख कर आते हैं उधर ही दिशा मैदान भी निबट लेंगे।
दोनो दोस्त सुबह सुबह नदी किनारे टहलते रहे और घटना से जुड़ी कोई संभावित चीज़ ढूंढते रहे लेकिन नाकाम रहने पर मुस्कुरस्ते हुए लौट आये।
नृपेन्द्र शर्मा "सागर"
9045548008
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