थोड़ा ज्यादा
"गंगू बाई! क्या थोड़ा ज्यादा कमाई करना चाहती हो?" एक अजनबी ने काम से थकी-हारी लौटती गंगू बाई के सामने आकर अचानक से पूछा तो उसकी आँखें लालच में बड़ी हो गयीं और वह चेहरे पर आए भाव छिपाते हुए उस आवाज की ओर घूम गयी, मानों पूछ रही हो, "कैसे?"
"बहुत आसान है गंगू बाई! बस तुम्हें अपना नार्मल काम करते हुए हमारे एक डिवाइस को ऑन करके अपने माथे के ऊपर बांधना होगा और उसके लिए हम तुम्हें हर एक घण्टे के दो सौ रुपये देंगे।" सामने खड़ा एक सूट-बूट पहने स्मार्ट सा लड़का मुसकुराते हुए कह रहा था।
"लेकिन उससे क्या होगा और खाली एक डिब्बा माथे पर बांधने का तुम मेरे को इतना पैसा क्यों देगा साब?" अब गंगू से रहा नहीं गया और वह और ज्यादा जानने की उत्सुकता में उस लड़के के नजदीक जाकर पूछने लगी।
"देखो गंगू मेम, ये एक A I की डिवाइस है जिससे हम बस घर के काम-काज की कुछ बेसिक वीडियो रिकार्ड करेंगे और कुछ नहीं और हाँ, ये डिवाइस सौ ग्राम से भी कम भारी है।" तभी उस लड़के के पीछे से निकलते हुए उसी की तरह कपड़े-जूते पहने हुए एक लड़की मुस्कुरा कर बहुत मधुर आवाज में बोली।
"आ2 ईयी! ये क्या है मेडम जी? मेरे को तो कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा।" गंगू बाई उस लड़की की ओर देखते हुए बोली। लेकिन पैसे का लालच उसके चेहरे पर साफ दिख रहा था क्योंकि ये लोग उसे बिना किसी काम के, बस एक डिब्बी सिर पर बांधने के लिए उसकी तनख्वाह से दुगने से भी ज्यादा पैसे दे रहे थे और वह भी बिना उसका काम छुड़ाए, मतलब नौकरी के साथ ही वह कुछ ज्यादा पैसे कमा सकती थी।
"अरे गंगू बाई! ज्यादा मत सोचो। ये लो डिवाइस और इसे बस इस तरह अपने सिर पर पहन लेना, जब भी आप अपना बाई वाला काम करना शुरू करो जैसे झाड़ू, पोंछा, बर्तन, खाना और कपड़े आदि, जो भी काम आप अपनी जॉब में करती हैं।" उस लड़की ने झट से अपने बैग में से निकालकर एक कोई दो इंच लंबी और एक इंच चौड़ी स्क्रीन जैसी डिवाइस गंगू के माथे पर रखकर उसकी बेल्ट को उसके सिर के पीछे फँसाकर टाइट कर दिया।
गंगू को यह बिल्कुल भी असहज नहीं लग रहा था जिसे लगाकर वह अपना काम न कर सके।
"और ये लीजिए पूरे पाँच हजार रुपये एडवांस, इस महीने के। अगले महीने हम फिर मिलेंगे और आपको आपके काम के घण्टों के हिसाब से पैसे दे देंगे।" यह कहकर वह दोनों लोग वहाँ से चले गए।
गंगू फ्री में इतने सारे पैसे मिलने से बहुत खुश थी, अब वह अपना काम बहुत अच्छे से करती और कोशिश करती की टाइम भी ज्यादा लगाए जॉब के कामों में।
एक महीना बीत चुका था, गंगू बाई खुशी से गुनगुनाते हुए काम पर जा रही थी। आज वह बहुत खुश थी क्योंकि उसे दो जगह से सेलरी मिलने वाली थी।
गंगू ने जाकर मालिकों के घर की घण्टी बजायी तो दरवाजा खोलने के बजाय मालकिन खुद बाहर आ गयी और बोली, "ये ले गंगा अपनी गए महीने की तनख्वाह और एक महीने के पैसे ज्यादा, अब कल से काम पर मत आना।" कहकर पैसे गंगा के हाथ पर रखकर मालकिन अंदर जाने लगी।
"लेकिन क्यों मालकिन! आप मुझे काम से क्यों निकाल रही हैं?" गंगा को समझ ही नहीं आ रहा था कि अचानक उसकी दस साल पुरानी मालकिन एकदम से ऐसे बदल कैसे गयी।
"कुछ नहीं गंगा, हमने अब किसी और को काम पर रख लिया है तो तू अब कहीं और काम ढूंढ ले और इसी लिए तो तुझे हमने 'कुछ ज्यादा' पैसे दिए हैं, पूरे एक महीने का एडवान्स।" मालकिन रूखे स्वर में बोली।
"नई बाई! लेकिन कौन मालकिन? इधर तो मैं ही दस साल से काम कर रही है।" गंगा बाई ने उदास होकर पूछा।
"एक A I रोबोट, “गंगा दा बाई” वह बिल्कुल तेरे जैसी ही है गंगा और काम! काम तो तुझसे 'थोड़ा ज्यादा' ही करती है, न थकान, न बीमारी न ही छुट्टी।" कहकर मालकिन ने दरवाजा बंद कर लिया और गंगा वहीं सिर पकड़कर नीचे बैठ गयी, उसके कानों में दो शब्द हथौड़े की तरह बज रहे थे, "थोड़ा ज्यादा।"
नृपेंद्र शर्मा "सागर"
ठाकुरद्वारा मुरादाबाद